शुक्रवार, ६ ऑगस्ट, २०१०

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये - ओबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये - ओबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो के दम निकल जाये
(अज़ीज =प्यारा / प्रिय)

मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी
के रूह गर्मी-ए-अंफास से पिघल जाये
(रूह =आत्मा / आत्मा)

मुहब्बतों में अजब है दिलों को धडका सा
के जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

रहे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा तर में रहे
ख़ुशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाये
(ख़ुशा =ख़ुशी से भरा / ख़ुशी की बात)

मैं वो चराग़-ए-सर-रहगुज़ार-दुनिया हूँ
जो अपनी ज़ात की तन्हाईयों में जल जाये
(चराग़ =चिराग / रोशनी; सर =लेकर / साथ में; ज़ात =शख़्सियत / व्यक्तित्व / अस्तित्व)

हर इक लहजा यही आरज़ू यही हसरत
जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाये
(लहजा =अंदाज़ / शैली / ढंग; आरज़ू =इच्छा / चाह; हसरत =आकांक्षा / मुराद)

- ओबैदुल्लाह अलीम

गुरुवार, ५ ऑगस्ट, २०१०

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया - सागर सिद्दिकि

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया - सागर सिद्दिकि

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया
हम ने अपनी ख़ुशी को बेच दिया
(अज़मत =अहमियत)

चस्म-ए-साकी के इक इशारे पे
उम्र की तिश्नगी को बेच दिया
(चस्म-ए-साकी =पिलाने वाले की नज़र / जाम भरने वाले की नज़र )

रिंद जाम-ओ-सुबू पे हँसते हैं
शैख़ ने बन्दगी को बेच दिया
(रिंद =शराबी; जाम-ओ-सुबू =जाम और सुराही; शैख़ =उपदेशक; bandagii =भक्ति / निष्ठा)

राहगुज़ारों पे लुट गई राधा
शाम ने बाँसुरी को बेच दिया

जगमगाते हैं वहशतों के दयार
अक्ल ने आदमी को बेच दिया
(वहशत =एकांत / निर्जन; दयार =स्थान / जगह)


लब-ओ-रुख़सार के इवज़ हम ने
सितवत-ए-ख़ुसरवी को बेच दिया
(लब-ओ-रुख़सार =अधर / ओंठ और गाल; इवज़ =के बजाय / के बदले)
(सितवत =शाही / राजसी; ख़ुसरवी =शाही / राजसी)

इश्क बेहरूपिया है ऐ 'सागर'
आप ने सादगी को बेच दिया
(सादगी =सरलता / सादापन)

- सागर सिद्दिकि

ऐ मौत! उन्हें भुलाये ज़माने गुज़र गये - ख़ुमार ब़राबंक्वी

ऐ मौत! उन्हें भुलाये ज़माने गुज़र गये - ख़ुमार ब़राबंक्वी

ऐ मौत! उन्हें भुलाये ज़माने गुज़र गये
आ जा कि ज़हर खाये ज़माने गुज़र गये

ओ जाने वाले आ कि तेरे इंतज़ार में
रस्ते को घर बनाये ज़माने गुज़र गये

ग़म है ना अब ख़ुशी है ना उम्मीद ना यास
सब से नजात पाये ज़माने गुज़र गये
(यास =मायूसी / निराशा)

क्या लायक-ए-सितम भी नहीं अब मैं दोस्तों
पत्थर भी घर में आये ज़माने गुज़र गये

जाने बहार फूल नहीं आदमी हूँ मैं
आ जा कि मुस्कुराये ज़माने गुज़र गये

क्या क्या तवक्को'अत थी आहों से ऐ 'ख़ुमार'
ये तीर भी चलाये ज़माने गुज़र गये
(तवक्को =भरोसा / उम्मीद)

- ख़ुमार ब़राबंक्वी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये - बेहज़ाद लख़नवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये - बेहज़ाद लख़नवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये
मंज़िल के लिये दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाये
(जज़्बा =अनुभूति / भावना / जोश / संवेदनशीलता; मुकाबिल =सामने / आगे; गाम =क़दम / पग)

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
इस राह-ए-मुहब्बत में कोई दरपैश जो मुश्किल आ जाये

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाये
(खलिश =दर्द / पीड़ा / चुभन)

ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंजिल आ जाये
(रहबर =सहयात्री / हमराह; कामिल =पूरा / मुकम्मल / पूर्ण; रहबर-ए-कामिल = पूर्ण रुप से सहचारी)

अब क्यूँ ढूँढ़ू वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाये
(चस्म-ए-करम =कृपादृष्टी; पास-ए-मुश्किल =मुश्किल के और आगे)

इस जज़्ब-ए-दिल के बारे में एक मशवरा तुम से लेता हूँ
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मेरा दिल आ जाये
(लाज़िम =अनिवार्य / सार / तत्त्व)

ऐ बर्क़-ए-तजल्लि क्या तूने मुझको भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाये
(बर्क़ =बिजली; तजल्लि =अभिव्यक्ति / एलान)

आता है जो तूफ़ाँ आने दो कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाये

- बेहज़ाद लख़नवी

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे - शहिद मीर

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे - शहिद मीर

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे
या छलकती आँखो को भी पत्थर कर दे

तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैं ने
आ किसी दिन मेरे एहसास को पैकर कर दे
(पैकर =रूप / आकार)

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
(दरकार =अपेक्षित / चाह)

- शहिद मीर

आप को भूल जायें हम् इतने तो बेवफा नहीं - तस्लीम फ़ज़ली

आप को भूल जायें हम इतने तो बेवफा नहीं - तस्लीम फ़ज़ली

आप को भूल जायें हम इतने तो बेवफा नहीं
आप से क्या गिला करें आप से कुछ गिला नहीं

शीशा-ए-दिल को तोडना उनका तो इक खेल है
हमसे ही भूल हो गई उनकी कोई खता नहीं

काश वो अपने ग़म मुझे दे दें तो कुछ सुकूँ मिले
वो कितना बदनसीब है ग़म ही जिसे मिला नहीं

करना है गर वफा तो क्या कैसे वफा को छोड दूँ
कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नहीं

- तस्लीम फ़ज़ली

गुरुवार, १५ जुलै, २०१०

आप में गुम हैं मगर सब की ख़बर रखते हैं - ज़मिल मलिक

आप में गुम हैं मगर सब की ख़बर रखते हैं - ज़मिल मलिक

आप में गुम हैं मगर सब की ख़बर रखते हैं
घर में बैठे हैं ज़माने पे नज़र रखते हैं

नुक्ताचीं देखिये किस किस पे नज़र रखते हैं
हम भी ऐ दीदावारो ऐब-ओ-हुनर रखते हैं
(नुक्ताचीं =आलोचक; दीदावारो = वो लोग, जो विश्लेषण या आलोचना करते हैं)
(ऐब-ओ-हुनर =बुराई और भलाई/सदाचार)

हम से अब ऐ गर्दिश-ए-दौराँ तुम्हें क्या लेना है
इक ही दिल है सो वो ज़र-ओ-ज़बर रखते हैं
(गर्दिश्-ए-दौराँ =दुर्भाग्य के समय; ज़र-ओ-ज़बर =उतार चढ़ाव)

जिस ने इन तीरा उजालों का भरम रखा है
अपने सीने में वो नादीदा सहर रखते हैं
(तीरा उजाला =रोशनी जो अंधेरे से भरा है; नादीदा =अप्रत्यक्ष; सहर =सुबह/सवेरा)

रहनुमा खो गये मंज़िल तो बुलाती है हमें
पाँव ज़ख़्मी हैं तो क्या ज़ौक-ए-सफ़र रखते हैं
(रहनुमा =मार्गदर्शक; ज़ौक =स्वाद / दिलचस्पी)

वो अंधेरों के पयंबर हैं तो क्या ग़म है "ज़मिल"
हम भी आँखो में कई शम्स-ओ-कमर रखते हैं
(पयंबर =पैग़ंबर / भविष्यद्वक्ता; शम्स-ओ-कमर =चाँद और सूरज)

- ज़मिल मलिक

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-कलम करते रहेंगे

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-कलम करते रहेंगे - फैज अहमद फैज

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-कलम करते रहेंगे
जो दिल पे गुजरती है रकम करते रहेंगे
(परवरिश =शिक्षा / तालीम; लौह-ओ-कलम =लिखने का औजार)
(परवरिश-ए-लौह-ओ-कलम =लिखने के औजार का प्रशिक्षण; रकम = कि गिनती / रेकार्ड रखना)

असबाब-ए-गम-ए-इश्क बहम करते रहेंगे
वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे
(असबाब = वजह / सबब / मतलब; असबाब-ए-गम-ए-इश्क =इश्क के गम कि वजह)
(बहम = समेटना / इकट्ठा करना; दौराँ = वक़्त / युग / काल; वीरानी-ए-दौराँ =वक्त का ख़ालीपन)
(करम =मेहरबानी / उदारता)

हाँ तल्खी-ए-अय्याम अभी और बढेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क-ए-सितम करते रहेंगे
(तल्खी =कड़वा / द्वेषपूर्ण; अय्याम =दिन; तल्खी-ए-अय्याम =दिन का कडवापन)
(अहल-ए-सितम = तानाशही / अत्याचारी / जुल्मी लोग)
(मश्क-ए-सितम = अत्याचार / जुल्म सहने कि आदत )

मंजूर ये तल्खी ये सितम हम को गवारा
दम है तो मदावा-ए-अलम करते रहेंगे
(मातम = अलम =अफ़सोस / मातम; मदावा =इलाज / उपचार)
(मदावा-ए-अलम =मातम का इलाज)

मयखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ए-मय से
तज्जीन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे
(सुर्खी =लालिमा; सुर्खी-ए-मय =शराब के लाड़ले; तज्जीन =सजावट; दर =द्वार)
(बाम =छत / मेज़ें की क़तार; हरम = तीर्थस्थान)
(तज्जीन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम = तीर्थस्थान कि तरह द्वार और छतो कि सजावट)

बाकी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा
रंग-ए-लब-ओ-रुखसार-ए-सनम करते रहेंगे
(लब= होंठ; रुखसार= कपोल / गाल)
(रंग-ए-लब-ओ-रुखसार-ए-सनम =माशूक़ के होंठ और गाल का रंग)

इक तर्ज-ए-तगाफुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
(तर्ज= अंदाज़; तगाफुल = उपेक्षा / अवहेलना; अर्ज करना =व्यक्त करने के लिए)
(तमन्ना =इच्छा / आकांक्षा)
(तर्ज-ए-तगाफुल =उपेक्षा करने का अंदाज़; अर्ज-ए-तमन्ना =चाह को कहना)

- फैज अहमद फैज

मंगळवार, १३ जुलै, २०१०

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का - हरी मनचंदा 'बानी'

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का
उसे बहाना मिला मुझ से बात करने का

फिर इक मौज उसे खींच ले गई तह-ए-आब
तमाशा खत्म हुआ डूबने उभरने का
(तह-ए-आब =पानी के नीचे)

मुझे खबर है कि रस्ता मझार चाहता है
मैं खस्ता'पा सही लेकिन नहीं ठहरने का
(मझार =क़ब्र; खस्ता'पा = थका हुआ)

थमा के इक बिखरता गुलाब मेरे हाथ
तमाशा देख रहा है वो मेरे डरने का

ये आसमाँ में सियाही बिखेर दी किस ने
हमें था शौक बहुत इस में रंग भरने का

बस इक चीख गिरी थी पहाड से यकलख्त
अजब नजारा था फिर धुंध के बिखरने का
(यकलख्त =यकायक / अचानक)

- हरी मनचंदा 'बानी'

आगाज तो होता है अन्जाम नहीं होता

आगाज तो होता है अन्जाम नहीं होता - मीना कुमारी 'नाज'

आगाज तो होता है अन्जाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
(आगाज =प्रारंभ; अन्जाम = अंत / परिणाम)

जब जुल्फ की कालिख में घुल जाये कोई राही
बद'नाम सही लेकिन गुम'नाम नहीं होता
(कालिख = तिमिर / अंधेरा)

हंस हंस के जवाँ दिल के क्यों न चुनें टुकडे
हर शख्स की किस्मत में इनाम नहीं होता

बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाये वो जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिये कश्ती
साहील पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

- मीना कुमारी 'नाज'