गुरुवार, ५ ऑगस्ट, २०१०

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये - बेहज़ाद लख़नवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये - बेहज़ाद लख़नवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये
मंज़िल के लिये दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाये
(जज़्बा =अनुभूति / भावना / जोश / संवेदनशीलता; मुकाबिल =सामने / आगे; गाम =क़दम / पग)

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
इस राह-ए-मुहब्बत में कोई दरपैश जो मुश्किल आ जाये

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाये
(खलिश =दर्द / पीड़ा / चुभन)

ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंजिल आ जाये
(रहबर =सहयात्री / हमराह; कामिल =पूरा / मुकम्मल / पूर्ण; रहबर-ए-कामिल = पूर्ण रुप से सहचारी)

अब क्यूँ ढूँढ़ू वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाये
(चस्म-ए-करम =कृपादृष्टी; पास-ए-मुश्किल =मुश्किल के और आगे)

इस जज़्ब-ए-दिल के बारे में एक मशवरा तुम से लेता हूँ
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मेरा दिल आ जाये
(लाज़िम =अनिवार्य / सार / तत्त्व)

ऐ बर्क़-ए-तजल्लि क्या तूने मुझको भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाये
(बर्क़ =बिजली; तजल्लि =अभिव्यक्ति / एलान)

आता है जो तूफ़ाँ आने दो कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाये

- बेहज़ाद लख़नवी

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