शुक्रवार, ६ ऑगस्ट, २०१०

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये - ओबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये - ओबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज इतना ही रखो के जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो के दम निकल जाये
(अज़ीज =प्यारा / प्रिय)

मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी
के रूह गर्मी-ए-अंफास से पिघल जाये
(रूह =आत्मा / आत्मा)

मुहब्बतों में अजब है दिलों को धडका सा
के जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

रहे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा तर में रहे
ख़ुशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाये
(ख़ुशा =ख़ुशी से भरा / ख़ुशी की बात)

मैं वो चराग़-ए-सर-रहगुज़ार-दुनिया हूँ
जो अपनी ज़ात की तन्हाईयों में जल जाये
(चराग़ =चिराग / रोशनी; सर =लेकर / साथ में; ज़ात =शख़्सियत / व्यक्तित्व / अस्तित्व)

हर इक लहजा यही आरज़ू यही हसरत
जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाये
(लहजा =अंदाज़ / शैली / ढंग; आरज़ू =इच्छा / चाह; हसरत =आकांक्षा / मुराद)

- ओबैदुल्लाह अलीम

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