मंगळवार, १३ जुलै, २०१०

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का - हरी मनचंदा 'बानी'

अजीब तजुर्बा था भीड से गुजरने का
उसे बहाना मिला मुझ से बात करने का

फिर इक मौज उसे खींच ले गई तह-ए-आब
तमाशा खत्म हुआ डूबने उभरने का
(तह-ए-आब =पानी के नीचे)

मुझे खबर है कि रस्ता मझार चाहता है
मैं खस्ता'पा सही लेकिन नहीं ठहरने का
(मझार =क़ब्र; खस्ता'पा = थका हुआ)

थमा के इक बिखरता गुलाब मेरे हाथ
तमाशा देख रहा है वो मेरे डरने का

ये आसमाँ में सियाही बिखेर दी किस ने
हमें था शौक बहुत इस में रंग भरने का

बस इक चीख गिरी थी पहाड से यकलख्त
अजब नजारा था फिर धुंध के बिखरने का
(यकलख्त =यकायक / अचानक)

- हरी मनचंदा 'बानी'

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