गुरुवार, ५ ऑगस्ट, २०१०

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया - सागर सिद्दिकि

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया - सागर सिद्दिकि

अज़मत-ए-ज़िंदगी को बेच दिया
हम ने अपनी ख़ुशी को बेच दिया
(अज़मत =अहमियत)

चस्म-ए-साकी के इक इशारे पे
उम्र की तिश्नगी को बेच दिया
(चस्म-ए-साकी =पिलाने वाले की नज़र / जाम भरने वाले की नज़र )

रिंद जाम-ओ-सुबू पे हँसते हैं
शैख़ ने बन्दगी को बेच दिया
(रिंद =शराबी; जाम-ओ-सुबू =जाम और सुराही; शैख़ =उपदेशक; bandagii =भक्ति / निष्ठा)

राहगुज़ारों पे लुट गई राधा
शाम ने बाँसुरी को बेच दिया

जगमगाते हैं वहशतों के दयार
अक्ल ने आदमी को बेच दिया
(वहशत =एकांत / निर्जन; दयार =स्थान / जगह)


लब-ओ-रुख़सार के इवज़ हम ने
सितवत-ए-ख़ुसरवी को बेच दिया
(लब-ओ-रुख़सार =अधर / ओंठ और गाल; इवज़ =के बजाय / के बदले)
(सितवत =शाही / राजसी; ख़ुसरवी =शाही / राजसी)

इश्क बेहरूपिया है ऐ 'सागर'
आप ने सादगी को बेच दिया
(सादगी =सरलता / सादापन)

- सागर सिद्दिकि

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