शुक्रवार, ९ जुलै, २०१०

कभी जो निखत-ए-जुल्फ-ए-निगार आई है

कभी जो निखत-ए-जुल्फ-ए-निगार आई है - कौसर नियाजी

कभी जो निखत-ए-जुल्फ-ए-निगार आई है
फजा-ए-मुर्दा-ए-दिल में बहार आई है
(निखत =उसके (प्रेमिका के); निगार =सौंदर्य)
(निखत-ए-जुल्फ-ए-निगार =उसके बालों की ख़ूशबू)
(फजा-ए-मुर्दा-ए-दिल =मुरदा दिल वातावरण में / हवां में)

जरूर तेरी गली से गुजर हुआ होगा
कि आज बाद-ए-सबा बेकरार आई है
(बाद-ए-सबा =सुबह की मंद हवां)

कोई दिमाग़ तसव्वुर भी जिन का कर ना सके
ये जान-ए-जार वो लम्हें गुजार आई है
(तसव्वुर =कल्पना; जान-ए-जार =कठिनाइयों से भरा जीवन)

ख़ुदा गवाह के उन के फिराक में 'कौसर'
जो साँस आई है वो सोगवार आई है
(फिराक =विरह / वियोग; सोगवार =उदास / शोकाकुल)

- कौसर नियाजी

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