सोमवार, १२ जुलै, २०१०

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक -मिर्झा गालिब

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक
(आह =रोने का एक संकेत / दुख / तड़प, जुल्फ के सर =बालो को जीतना)

दाम हर मौज में है हल्का-ए-सद'काम-ए-नहंग
देखें क्या गुजरे है कतरे पे गौहर होने तक
(दाम = जाल; मौज = लहर; हल्का =बाड़ा)
(सद=सौ; नहंग =मगरमच्छ; गौहर =मोती)
(हल्क-ए-सद'काम-ए-नहंग =बाड़ा में सौ जबड़े के मगरमच्छ के साथ)

आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं खून-ए-जिगर होने तक
(सब्र-तलब =सहनशील; तमन्ना =मुराद / इच्छा / वासना; बेताब =बेसब्र / बेक़रार)

हम ने माना के तगाफुल ना करोगे लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुम को खबर होने तक
(तगाफुल =ग़फ़लत / उपेक्षा; खाक =धूल)

पर्तव-ए-खूर से है शबनम को फना की तालीम
मैं भी हूं इक इनायत की नजर होने तक
(पर्तव-ए-खूर = सूरज की किरणों; शबनम =ओस; फना = नाश / तबाह होना)
( तालीम=शिक्षा; इनायत = अनुग्रह / अतिकृपा)

-मिर्झा गालिब

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