शायद अभी है राख में कोई शरार भी - अदा जाफ्री
शायद अभी है राख में कोई शरार भी
क्यों वर्ना इन्तजार भी है इज्तिरार भी
(शरार =चमक / उत्साह; इज्तिरार =बेचैनी / तड़प)
ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का
मिलने को मिल गया है सुकून भी करार भी
(मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद = एक असफल / बदकिस्मत दिल की मौत)
अब ढूंढने चले हो मुसाफिर को दोस्तो
हद्द-ए-निगाह तक ना रहा जब गुबार भी
(हद्द-ए-निगाह= नज़र की हद; गुबार =धूल-मिट्टी)
हर आस्ताँ पे नासिया'फर्सा हैं आज वो
जो कल ना कर सके थे तेरा इन्तजार भी
(आस्ताँ = कगार; नासिया'फर्सा = एक जो उसके माथे को रगड़ता है)
इक राह रुक गई तो ठिठक क्यों गई 'अदा'
आबाद बस्तियाँ हैं पहाडों के पार भी
(ठिठकना =ठहरना / थमना)
- अदा जाफ्री
शायद अभी है राख में कोई शरार भी
क्यों वर्ना इन्तजार भी है इज्तिरार भी
(शरार =चमक / उत्साह; इज्तिरार =बेचैनी / तड़प)
ध्यान आ गया है मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद का
मिलने को मिल गया है सुकून भी करार भी
(मर्ग-ए-दिल-ए-नामुराद = एक असफल / बदकिस्मत दिल की मौत)
अब ढूंढने चले हो मुसाफिर को दोस्तो
हद्द-ए-निगाह तक ना रहा जब गुबार भी
(हद्द-ए-निगाह= नज़र की हद; गुबार =धूल-मिट्टी)
हर आस्ताँ पे नासिया'फर्सा हैं आज वो
जो कल ना कर सके थे तेरा इन्तजार भी
(आस्ताँ = कगार; नासिया'फर्सा = एक जो उसके माथे को रगड़ता है)
इक राह रुक गई तो ठिठक क्यों गई 'अदा'
आबाद बस्तियाँ हैं पहाडों के पार भी
(ठिठकना =ठहरना / थमना)
- अदा जाफ्री
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