गुरुवार, ८ जुलै, २०१०

आज मेरे शब-ए-फुर्कत की सहर आई है

आज मेरे शब-ए-फुर्कत की सहर आई है - शमिम जयपुरी

आज मेरे शब-ए-फुर्कत की सहर आई है
मुद्दतों बाद तेरी राहगुजर आई है
(शब-ए-फुर्कत =जुदाई / विरह की रात; सहर =सुबह / प्रभात / भोर)
(राहगुजर =रास्ता / राह)

देख तो लीजिये मेरे ख़ून-ए-तमन्ना कि बहार
जिस की सुर्ख़ी मेरी आँखों में उतर आई है
(ख़ून-ए-तमन्ना =चाहत का ख़ून / लहू ; सुर्ख़ी =लालिमा)

तूने तो तर्क-ए-मुहब्बत की कसम खाई थी
क्यों तेरी आँख मुझे देख के भर आई है
(तर्क-ए-मुहब्बत = मोहब्बत का अस्वीकार / त्याग)

उन के पैराहन-ए-रंगीन की महक है इस में
आज क्या बाद-ए-सबा हो इक उधर आई है
(पैराहन-ए-रंगीन = ख़ूबसूरत कपड़े / रचना; महक =सुगंध / सुवास)
(बाद-ए-सबा =सुबह की सौम्य / मंद हवा)

इस में कुछ उन की जफायें भी तो शामिल हैं 'शमिम'
बेवफाई की जो तोहमत मेरे सर आई है
(जफा = ज़ुल्म / अन्याय / बेइंसाफी; तोहमत =आरोप / इलज़ाम )

- शमिम जयपुरी

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