गुरुवार, ८ जुलै, २०१०

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं - जिगर मोरादाबादी

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे जमाना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

बेफायदा आलम नहीं, बेकार ग़म नहीं
तौफीक दे ख़ुदा तो ये ने'अमत भी कम नहीं
(आलम =अफ़सोस; तौफीक =दैवी शक्ति; ने'अमत =दैवी आशीर्वाद)

मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं
मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं
(शिकवा-ए-अहल-ए-सितम =अत्याचारी लोगो की शिकायत)

या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वस्'अतें
दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं
(हुजूम-ए-दर्द =दर्द की भीड़; वस'अतें =तनना / खिंचते हुए लंबा हो जाना)

झाहीद कुछ और हो ना हो मयखा़ने में मगर
क्या कम ये है की शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं
(दैर =मंदिर; हरम =मस्जिद; शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम =मंदिर और मस्जिद के लिये शिकायत)

शिकवा तो इक छेड है लेकिन हकीकतन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं
(इनायत =मेहरबानी /कृपा)

मर्ग-ए-जिगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं
(मर्ग-ए-जिगर ='जिगर' की मृत्यु; अश्क-रेज़ =आँसू से भरी;सानिहा =घटना; अहम =महत्त्वपूर्ण)

- जिगर मोरादाबादी

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