बुधवार, ३० जून, २०१०

आग पूरी कहां बुझी है अभी

आग पूरी कहाँ बुझी है अभी - मिदाहतुल अख्तर

आग पूरी कहाँ बुझी है अभी
दीदा-ए-तर में तिश्नगी है अभी
(दीदा-ए-तर =आँसुओं से भरी आँखों / भिगी आँखें; तिश्नगी =तृष्णा / प्यास)

दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब
दुश्मनों से कहाँ ठनी है अभी

दोस्त कह कर मुझे न दे गाली
दिल पे इक ज़ख्म-ए-दोस्ती है अभी

काट दे ये भी खुद-परस्ती में
और थोडी सी ज़िदगी है अभी
(खुद-परस्ती =अहंमानी / अहंकारी)

जाने क्यों कुंद हो गया नश्तर
ज़ख्म की धार तो वही है अभी
(कुंद =रूक्ष / प्रभावहीन; नश्तर =चाकू)

- मिदाहतुल अख्तर

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत: