आग पूरी कहाँ बुझी है अभी - मिदाहतुल अख्तर
आग पूरी कहाँ बुझी है अभी
दीदा-ए-तर में तिश्नगी है अभी
(दीदा-ए-तर =आँसुओं से भरी आँखों / भिगी आँखें; तिश्नगी =तृष्णा / प्यास)
दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब
दुश्मनों से कहाँ ठनी है अभी
दोस्त कह कर मुझे न दे गाली
दिल पे इक ज़ख्म-ए-दोस्ती है अभी
काट दे ये भी खुद-परस्ती में
और थोडी सी ज़िदगी है अभी
(खुद-परस्ती =अहंमानी / अहंकारी)
जाने क्यों कुंद हो गया नश्तर
ज़ख्म की धार तो वही है अभी
(कुंद =रूक्ष / प्रभावहीन; नश्तर =चाकू)
- मिदाहतुल अख्तर
आग पूरी कहाँ बुझी है अभी
दीदा-ए-तर में तिश्नगी है अभी
(दीदा-ए-तर =आँसुओं से भरी आँखों / भिगी आँखें; तिश्नगी =तृष्णा / प्यास)
दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब
दुश्मनों से कहाँ ठनी है अभी
दोस्त कह कर मुझे न दे गाली
दिल पे इक ज़ख्म-ए-दोस्ती है अभी
काट दे ये भी खुद-परस्ती में
और थोडी सी ज़िदगी है अभी
(खुद-परस्ती =अहंमानी / अहंकारी)
जाने क्यों कुंद हो गया नश्तर
ज़ख्म की धार तो वही है अभी
(कुंद =रूक्ष / प्रभावहीन; नश्तर =चाकू)
- मिदाहतुल अख्तर
कोणत्याही टिप्पण्या नाहीत:
टिप्पणी पोस्ट करा