बुधवार, ३० जून, २०१०

वक्त-ए-सफर करीब है बिस्तर समेट लूँ

वक्त-ए-सफर करीब है बिस्तर समेट लूँ - अझमल अझमाली

वक्त-ए-सफर करीब है बिस्तर समेट लूँ
बिखरा हुआ हयात का दफ्तर समेट लूँ
[वक्त-ए-सफर = यात्रा करने के लिए समय; करीब = निकट / नज़दीक)
(समेटना =इकट्ठा करना; बिखरा =अस्तव्यस्त; हयात =जीवन)

फिर जाने हम मिले ना मिले इक जरा रुको
मैं दिल के आईने में ये मंज़र समेट लूँ
(मंज़र =दर्शन / दृष्य)

गैरों ने जो सलूक किये उन का क्या गिला
फेंके है दोस्तोंने जो फत्थर समेट लूँ
(गैर =अजनबी / प्रतिद्वंद्वी; सलूक =वर्तन / आचरण; गिला =शिकायत)

कल जाने कैसे होंगे कहाँ होंगे घर के लोग
आखों में एक बार भरा घर समेट लूँ

सैल-ए-नजर भी गम की तमाज़त से खुश्क हो
वो प्यास है मिले तो समंदर समेट लूँ
(सैल =सैलाब; सैल-ए-नजर =आँसू; तमाज़त =गर्मी / दाह; खुश्क =सूखा / शुष्क / नीरस)

'अझमल' भडक रही है जमाने में जितनी आग
जी चाहता है सीने के अंदर समेट लूँ

- अझमल अझमाली

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत: