मंगळवार, १३ जुलै, २०१०

यूं ना मिल मुझ से खफा हो जैसे - एहसान दनिश

यूं ना मिल मुझ से खफा हो जैसे - एहसान दनिश

यूं ना मिल मुझ से खफा हो जैसे
साथ चल मौज-ए-सबा हो जैसे
(मौज-ए-सबा = सौम्य ठंडी लहरें)

लोग यूं देख कर हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क को शिर्क की हद तक ना बढा
यूं ना मिल हमसे खुदा हो जैसे
(शिर्क =बहुदेववाद / कई देवताओं पर आस्था)

मौत भी आई तो इस नाज के साथ
मुझ पे एहसान किया हो जैसे
(नाज =नम्रता)

ऐसे अनजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी ना पता हो जैसे

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे

जिंदगी बीत रही है 'दानिश'
इक बेजुर्म सजा हो जैसे

- एहसान दनिश

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत: