सोमवार, ५ मे, २००८

हैदराबादी कविता...

हाथा मे हाथ मिलाके
हाथा मे हाथ मिलाके
अंगूठी चुराके उनो चली गयी
अभी गले मिलनेकू आरी
क्या करती की क्या की...

चाय पीनेकू आके
चाय पीनेकू आके
सॉसर चुराके उनो चली गयी
अभी फुल मिल्सकू आरी
क्या करती की क्या की...

पहलीच मुलाकातमे
पहलीच मुलाकातमे
फाय स्टार मे मेरेकू चुना लगाई
अभी डेट पे ले जाओ बोलरी
क्या करती की क्या की...

सगाई-सगाई बोलके
सगाई-सगाई बोलके
पूरी शॉपिंग कराली
अभी शादी-शादी बोलरी
क्या करती की क्या की...

स्वरचित नाही... (अनभिषिक्त - अभिजीत)

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